जिंदगी की उलझने देखकर मन घबरा सा जाता है लेकिन फिर अगले ही पल ख्याल घरवालों का आता है। बेटे की पढ़ाई और उसका भविष्य सोचकर दिमाग़ थोड़ा सा स्तब्ध हो जाता है। छोटी सी कमाई में खर्चे हजारों के मन इस बात से मेल नही खाता है। माँ-पापा की सेहत,भाई-बहन की फिक्र में दिमाग़ मुझे ही भूल जाता है। पत्नी की शिकायते बहुत है मगर अपनी व्यस्त जीवन शैली में मन ये बात कंहा जान पाता है। सुबह से रात का सफ़र तय करना फिर रात से सुबह की बाट थक कर पड़ा बिस्तर पर दिल समझ ही नही पाता है। गुज़र रही है जिंदगी एक बोझ सी मगर अपनों की खातिर इसे अलविदा भी तो नहीं कहा जाता है। Ranjan
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